सफर

सफर अंजाना ही सही, मगर जान थी उसमें.

 प्यार ही प्यार था उसमें,  नई पहचान थी उसमें.

 अजब सा मोड़ आया, जिंदगी  बिखरी लगी लगने. 

बिरानी सुबह लगती है, लूटी थी शाम  अब उसमें.


 स्वरचित,  अप्रकाशित एवं मौलिक रचना

 लेखिका/ रचनाकार: रीता तिवारी  "रीत"

 संप्रति: अध्यापिका ,स्वतंत्र लेखिका एवं कवयित्री

 शिक्षा: एमए समाजशास्त्र ,बी एड, सीटीईटी उत्तीर्ण 

मऊ, उत्तर प्रदेश से