मेरी कविता इन दिनों

हठधर्मिता का शिकार हो गई है 

मैं किसी और बिम्ब को चुनता हूँ 

वह किसी और बिम्ब पर आ जाती है 

कल ही की बात है,मैने पूछ लिया 

तुम्हारे स्वभाव में यह परिवर्तन क्यों 

तुम अपने सृजक की सुनती क्यों नहीं

इस मनमानी की कोई वज़ह हो तो 

बेशक़ साझा कर सकती हो 

उसका प्रत्युत्तर क्षण भर में आ गया 

एक शर्त पर साझा कर सकती हूँ 

चलो पहले शर्त तो जान लूं

बस इतना ही कि तुम सृजन 

बन्द मत कर देना वर्ना 

मेरी बात रखेगा कौन 

तुम्हारी शर्त स्वीकार है मुझे 

अब तो बताओ क्या बात है

मैं इन दिनों पशोपेश मे रहा करती हूँ

वर्तमान हालात मुझे पीड़ा देते हैं

इस महामारी ने मेरे वज़ूद को 

जकड़ रखा है/नतीजतन 

मैं खुद को कुछ सीमित शब्दों के 

चक्रव्यूह में घिरा पाती हूँ 

जलती चिताओं के बिम्ब मुझे 

अन्दर तक झकझोर देते हैं 

मृतक परिवारों के रूदन के लिए 

बार बार इस्तेमाल होने से

मेरा कलेजा पत्थर का हो गया है

इंसानियत को शर्मसार होते देख कर 

अब इंसानों के हुजूम से दूर जाना चाहती हूँ 

शायद यही मेरे मन की व्यथा है 

जिसने मुझे हठधर्मी बना दिया है 

बस मेरी एक छोटी सी इल्तेज़ा है 

मुझे इन सबसे दूर ले चलो ताकि मैं 

खुल कर सांस ले सकूं 

कुछ साकारात्म्क सोच सकूं 

मेरा कोमल हृदय और दुखित ना हो सके 

दु:ख,करुणा और विषाद की छाया तक से 

मैं बहुत दूर चली जाना चाहती हूं 

और मुझे पूरा विश्वास है कि 

यह काम सिर्फ और सिर्फ मेरा 

सृजक ही कर सकता है 

बस यही गुजारिश है तुमसे 

मुझे कुछ नये बिम्ब दो 

मुझे कुछ नये भाव दो 

मुझे कुछ नये शब्द दो 

ताकि हम और तुम मिलकर 

कुछ ऐसा सृजन करें

जो इस फिज़ा को बदलने में 

मील का पत्थर साबित हो सके 


राजेश कुमार सिन्हा 

बान्द्रा(वैस्ट),मुम्बई 50