मुक्तक

हुआ  भयभीत  मानव है अटकने लग गई सांसे

हुआ  दुश्वार  जीना है मनुज नित जा रहा जाँ से 

कहर कितना सहें अब तो बता दो ऐ मेरे मालिक

धंसा दलदल में है जीवन समय भी दे रहा झांसे

निधि भार्गव मानवी