तमाशा खूब देखा है..

बड़े मगरूर हो  साहब,  तमाशा  खूब  देखा  है।

जाने चौसर में तुमने, क्या पांसा  खूब  फेंंका है?

तड़पकर मर रही जिंदगी मगर तुम ध्यान न देना

जलती  हुईं  चिताओं  पर  रोटियां  खूब सेका है।

भरोसा  था  जो  तुमपर  अब भरोसा टूट गया है।

बड़ा  दुर्भाग्य  है  सबका  न  जाने  कैसी रेखा है।

लगाकर  आस  बैठे  थे  कि  अच्छे  दिन  आएंगे।

हुए  हैं  ख्वाब   चकनाचूर  यह   कैसी  लेखा  है।

कभी  आइने  में  अपनी  सूरत  देखना  तुम  भी

मजलूमों  के सहारों का कहाँ और कौन ठेका है।


रवि श्रीवास्तव

रायबरेली, उत्तर प्रदेश