प्राथमिक शिक्षा में तकनीकी : एक प्रयोग

मैं प्राथमिक विद्यालय भगेसर, मीरजापुर में पिछले 5 वर्षों से प्रधानाध्यापक के पद पर कार्यरत हूँ। मैंने पिछले वर्ष के कोरोना महामारी से उत्पन्न हुए विभत्स रूप को देखा है। मुझे आज भी याद है पिछले वर्ष का मई माह, जब विद्यालय पूर्णतः बंद हो चुके थे और बच्चों का पठन पाठन पूर्णतया ठप्प पड़ चुका था। सरकारी नियमानुसार मुझे सड़क पर चलने की आजादी मिली थी क्योंकि मेरी ड्यूटी खाद्यान्न वितरण केंद्र (कोटा) पर लगाई गई थी। कोटे पर मुझे मेरे यहाँ पढ़ने वाले बच्चों से संबंधित अभिभावक मिलते थे जो स्कूल के खुलने को लेकर बातें किया करते थे। उनका मानना था कि स्कूलबंदी के कारण बच्चों के अंदर उच्छृंखलता और निरंकुशता तेजी से पांव पसार रही थी। उनके बहुत सारे प्रश्न बच्चों के पढ़ाई-लिखाई व भविष्य से संबंधित होते थे। उनकी वार्ता में बच्चों की पढ़ाई में उत्पन्न बाधा को लेकर चिंतायें परिलक्षित होती थी। मेरा विद्यालय पूर्णतः ग्रामीण परिवेश में है और ऐसा पहली बार हुआ था जब आते-जाते किसी भी विद्यालय और किसी भी वय वर्ग के बच्चों का सड़क पर दिखाई देना पूर्णतः बंद हो चुका था।

        वर्तमान विद्यालय में कार्यभार ग्रहण करने के पश्चात भौतिक, शैक्षिक आदि सभी पहलुओं का चतुर्दिक विकास हुआ है, ऐसा वहाँ के लोगों और अभिभावकों का मानना था।आधिकारिक तौर पर भी न केवल जनपद स्तर पर बल्कि राज्य स्तर पर भी कला, साहित्य व अनेक शैक्षणिक गतिविधियों से संबंधित बहुत सी प्रतिभाएं वर्ष में एक बार से अधिक बार सम्मान प्राप्त करती थीं। लेकिन अब ये सिलसिला मानो थम सा गया था। मुझे भी विद्यालय के पास तक आना लेकिन विद्यालय और बच्चों के बीच न जा पाने का एक अधूरापन  अहसास दिलाता था। एक दिन खाद्यान्न वितरण केन्द्र से संबंधित सारी औपचारिकताओं को पूर्ण करने के पश्चात सहसा मैंने अपने विद्यालय वाले गांव में जाने का फैसला किया। मेरे इस फैसले से किसी भी सरकारी नियम ,कायदे और कानून का उल्लंघन नही होने वाला था क्योंकि मास्क , ग्लव्स , सेनेटाइजर आदि बहुत पहले से मेरी दिनचर्या में शामिल थे। बस आवश्यकता थी तो सिर्फ सामाजिक दूरी बनाये रखने की। लेकिन मन में एक विचार था कि अगर कोई बच्चा न दिखाई दिया तो मैं वापस लौट जाऊँगा। स्कूल के पास पहुंचने पर मुझे कुछ बच्चे दिखाई पड़ गये। बच्चे  विद्यालय के आसपास के घरों के थे।मुझे देखकर बच्चों के बीच से "सर जी आ रहे हैं, सर जी आ गए' का एक हर्ष नाद हुआ और देखा-देखी कुछ और बच्चों के साथ उनके अभिभावक भी मेरे पास आ गए। आज मैंने प्रत्यक्ष रूप से ये देख लिया था कि बचपन हर गम से अनजान होता है। मैंने सर्वप्रथम उन्हें सामाजिक दूरी को व्यवस्थित करने के विषय में राय दी और उसके बाद उन अभिभावकों से फोन नंबर लिया जिनके पास स्मार्ट फोन थे और उसमें वाट्सएप की उपलब्धता थी। मौखिक रूप से करीब डेढ़ घंटे हम लोगों की विभिन्न पहलुओं पर बातें और सवाल-जवाब हुए।  मेरे वापस चलने को तैयार होते-होते कुछ और बच्चों और अभिभावकों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई और उनसे भी नंबरों का आदान प्रदान हुआ। एक लंबे अंतराल के बाद बच्चों के बीच जाने का अनुभव मेरे जीवन के सुखद अनुभवों में से एक था। 

     मुझे स्मरण है कि उस रात मुझे बहुत ही सुकून भरी नींद आयी थी। अगले दिन सुबह एक फोन कॉल से मेरी नींद खुली। वो कॉल एक बच्चे, अंश प्रजापति कक्षा 3, द्वारा की गई थी। मैंने उससे बात की तथा उस दिन मैं सारे बच्चों को लेकर तकरीबन 17 बच्चों को वाट्सएप ग्रुप से जोड़कर,  इनफार्मेशन कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी,  के माध्यम द्वारा शिक्षण कार्य प्रारंभ किया। मैंने टीवी, ट्रांजिस्टर, यूट्यूब, रीड एलन्ग एप, दीक्षा एप आदि  शैक्षणिक स्रोत से अभिभावकों व बच्चों को परिचित कराया तथा प्रयोग विधि भी बताई। विभाग द्वारा चलाये जा रहे कई एजुकेशनल ऐप डाउनलोड कराया जिनका बच्चों ने बड़े ही रुचि के साथ संचालन व उपयोग किया। माह जुलाई के आते-आते बहुत सारे बच्चे ict के लगभग सभी साधनों को यथासंभव प्रयोग में लाना सीख चुके थे और सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में जो पूर्ण विराम लग चुका था। अब वह फिर से सुचारु रूप से चलने लगा था। अब मैं अक्सर उन बच्चों के बीच जाता और एक प्रगति रिपोर्ट तैयार करता था और कुछ नया और उनके रुचि के अनुसार सिखाने का प्रयास करता था जिसके परिणामस्वरूप दिन ब दिन उनमें और बेहतर प्रभाव दिखने लगा। परिवर्तन देख मुझे बहुत हर्ष है यह सिलसिला आज भी अनवरत रूप से चल रहा है।

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रविकांत द्विवेदी 

शिक्षक, मिर्जापुर (उ.प्र.)