"करकसर दूसरा भाई"

वक्त की मार ने आज आम इंसान की हालत खस्ता कर दी है। जो खानदानी रईस है उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता, पर मध्यम वर्ग और गरीबों का जीना मुहाल हो गया इस महामारी और लाॅक डाउन के चलते।

हमारे बड़े बुज़ुर्गो की कुछ बातें आज याद करेंगे तो अहसास होगा की बुज़ुर्गो की कही एक बात में तथ्य था, की करकसर  दूसरा भाई है। आज की पीढ़ी करकसर को लोभ की उपमा देती है। पर लोभ और करकसर में बड़ा फ़र्क होता है। 

लोभ यानी जहाँ जरूरत हो वहाँ भी आप जेब ढ़ीली ना करें, पैसों को महेत्व देते ना पेट में अच्छा खाना डाल सकें ना बिमार होने पर ठीक से इलाज करवाएं।

और करकसर यानी फ़िजूलाखर्च। हर दुकान में सेल चल रहा है तो जिस चीज़ की जरूरत न हो उसे भी उठा लाएं। या चद्दर छोटी हो फिर भी पैर फैलाए।

जब हाथ छूट होता है जेब भरी होती है तब हमें इल्म नहीं होता उड़ाते रहते है पैसे बेफ़ाम खर्चे करके।

कोरोना महामारी ने इंसान को एक बात बहुत बखूबी समझा दी है कि दुनिया की हर शै वक्त की गुलाम है। वक्त कब क्या हालात दिखाए कोई नहीं जानता।

आज जिन लोगों ने बचत के नाम पर  पूँजी जमा की होगी उनका ये खराब समय भी आसानी से कट गया होगा। तो हर इंसान को अपनी चद्दर अनुसार पैर फैलाने चाहिए पहले के ज़माना में ठीक था की तीज त्यौहार पर ही लोग नये कपड़े बनवाते थे। पर अब ऐसा नहीं जब मार्केट जाते है कुछ ना कुछ खरीद लाते है फिर चाहे जरूरत हो या न हो। और खास कर त्यौहारों पर छोटी दुकान से लेकर बड़े-बड़े मोल में डिस्काउन्ट के नाम पर आकर्षित ऑफ़रों से लोगों को ललचाया जाता है, और हम भी डिस्काउन्ट का नाम सुनते ही बिना सोचें उठा लाते है जरूरत से ज़्यादा कपड़े या सामान। तो त्यौहारों पर कपड़ों से लेकर कोई भी पड़ी हुई चीज़ों से अगर चल जाता हो वहां फ़िज़ूल खर्च पर कटौती करके चार पैसे जोड़ लेने चाहिए। 

दिखावे पर नहीं जाना चाहिए। अडोस-पडोस रिश्तेदारों की देखा देखी में अपने घर का बजेट खस्ता नहीं होना चाहिए। आज खाली जेब लिए आप एक कदम घर के बाहर नहीं रख सकते कदम-कदम पर पैसों की जरूरत पड़ती है, और फिर बुरा समय आगाह करके नहीं आता जमा पूंजी और निवेश ऐसे समय में राहत देगा और चार पैसे हाथ पर रहेंगे तो हर परिस्थिति से लडने का हौसला बना रहेगा।

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु