माँ के आँचल की छाया मे

माॅं   शब्द   पे   जितना  लिखूं,

उतना    कम   पड़  जाता   है,

माॅं  के  आंचल  की  छाया  में,

सारा     जग      समाया     है।

सब    रिश्तों    से    न्यारा   है,

माॅं और सन्तान  का यह नाता,

नौ   महीने    गर्भ   में   रखती,

जग से  पवित्र  है  यह  रिश्ता।

सहती  अनेकों  कष्ट  व  पीड़ा,

जब जन्म  सन्तान  को देती है,

सुनते किलकारी मात्रसे उसकी,

मुस्कान अधरों पर भर लेती है।

खुद सुविधाओंसे वंचित रखके,

उसका  भरण  पोषण करती है,

खुद   चाहे     अनपढ़   हो  माॅं,

पर    उसे   अच्छी     परवरिश, 

देने   की   कोशिश   करती  है।

बेटा   हो    या    बेटी    उसकी,

ममता  में   फर्क  ना  करती  है,

बचपन   से   लेके    बड़े   तक,

ऑंचल   की   छाया  रखती  है।

चोट  संतान   को  लगती  है तो,

दर्द  महसूस  खुद को  करती है,

चाहे     संतान     निकम्मी    हो,

फिक्र     तभी   भी   करती   है।

जन्मदाती   माॅं    का  हम   सब,

कर्ज  कभी नहीं  चुका सकते हैं,

बस जब तक है  सांस जीवन में,

माॅं   को   भुला  नहीं  सकते  हैं।


चंपा पांडे,वरिष्ठ कवयित्री व स्ववतन्त्र 

लेखिका,पालम-नई दिल्ली