अफवाहों से सावधान, विपक्ष?विकल्प? और भस्मासुर

एक बोधकथा है।सड़क पर पड़ी रस्सी को लोग भ्रम से ज़हरीला सर्प समझ कर डर रहे थे।रस्सी बीच सड़क पर पड़ी थी, दो नों और लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई। लोगों में सर्प को लेकर चर्चा शुरू हो गई।सभी अपने ज्ञान का बखान करने लगे।सर्प की प्रजातियों पर चर्चा करने लगे।कौनसा सर्प कितना,जहरीला होता है।कौन से सर्प के काटने से इंसान किनती देर तक जीवित रहता है।कुछ स्वयंभू ज्ञानी लोग सर्प के दंश से फैलने वाले जहर को किस तरह निकाला जाता है।सर्प के काटने के बाद उपचार विधि पर चर्चा करते हुए,उपचार की उपलब्धता की जानकारी भी देने लगे।इस तरह दोनों और भीड़ बढ़ती गई।आधे अधूरे ज्ञान का प्रवाह तेज होता गया।

यह सारा माजरा देख, एक समझदार व्यक्ति, हाथों में दिया लेकर आया,और दिये की रोशनी में उसने, उन *आँखों के अंधे लेकिन नाम नयन सुख* ऐसे लोगों को बता दिया,यह कोई सर्प नहीं है,सिर्फ रस्सी है।

इस तरह उस व्यक्ति ने लोगों के 'ज्ञान चक्षु ' खोनले का साहस दिखाया।

आज  ऐसे व्यक्ति की खोज आवश्यक हो गई है।

कोरोना का वाइरस जितना फैल नहीं रह है,उससे कई गुना अधिक  अफवाएं वाईरल हो रहीं हैं।

यदि हम मानव हैं,तो इस समय,हमें मर्ज की दवा खोजने के लिए अपना फर्ज अदा करन चाहिए।

इस समय हर एक को यह सिद्ध करना है कि वह 'literate है या educated ' अर्थात वह सिर्फ *पढा लिखा ही है,या शिक्षित भी है।*

वर्तमान में अफवाहों को फैलाने वाले,जान बूझकर  अफवाओं का सर्प बनाकर लोगों के बीच छोड़ा जा रहा है।

कोरोना की जाँच करने के लिए,प्लास्टिक की तीली को नाक में और मुँह में डाल कर सेंपल लिया जाता है।सेंपल की जांच होने पर पता चलता है कि,व्यक्ति कोरोना Positive या Negative है।

अफवाहों को फैलाने वालों की जाँच करना सम्भव ही नहीं है।त्रेतायुग की कथा में खलनायक रावण था।रावण के सिर्फ दस ही मुँह थे।अफवाहों फैलाने वालों के अनगिनत मुँह है।इनकी जाँच असम्भव है।यदि कोई जाँच करने का साहस भी करें,तो इनकी जांच Negative ही आयेगीं।कारण इनके संया ही कोतवाल बने हुएं हैं।

अफवाहों को फैलाने वाले लोग व्हाट्सएप विश्वविद्यालय में प्रशिक्षित होतें हैं।

नदी में तैरती मृत देहों की खबरें समाचार माध्यमों से प्रसारित हुई तो विपक्ष ने व्यवस्था की लापरवाही पर प्रश्न उपस्थित किए? यह विपक्ष का अधिकार और दायित्व भी है। अपनी लापरवाही को छिपाने के लिए इनलोगों ने विपक्षियों को गिद्ध की उपमा तक दे डाली।आमजन को तो प्रसन्नता होनी चाहिए कि, हमारे देश के स्वास्थ्य मंत्री को गिद्धों की लुप्त होती प्रजाति की कितनी चिंता है?एक कहावत है, खग ही जाने खग की भाषा।

बहरहाल अफवाह फैलाने वाले मरीज दिमागी तौर पर सिर्फ Negative ही नहीं होतें हैं,बल्कि Distractive भी होतें हैं।ये लोग हमेशा आमजन की मूल समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए ऊलजलूल व्यक्तव्य देतें रहतें हैं।इन लोगों को समाज के अंतिम सोपान पर खड़े व्यक्ति की पीड़ा कतई नहीं होती है।नित्य उपयोगी वस्तुओं के दाम बाजार में बेतहाशा बढ़ रहें हैं।इनलोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता है। इनलोगों का शगल(मन बहलाने का साधन) होता है,अफवाओं का बाजार गर्म रहना चाहिए।

सबसे बड़ी अफवाह तो यह फैलाई जा रही है कि वर्तमान सत्ताधीश कोई अवतार है।इस अवतरित पुरुष का कोई विकल्प मौजूद नहीं हैं?आज सियासत में कोई विपक्ष नहीं हैं?

ज्ञानचक्षु खोलने वालों के पास सच में तानाशाही प्रवृत्ति का विकल्प होता ही नहीं है।तानाशाही प्रवृत्ति के लिए विकल्प की जरूरत ही नहीं होती है।तानाशाही प्रवृत्ति का अंत भस्मासुर की तरह होता है। *भस्मासुर महापापी दैत्य था।भस्मासुर को शिवजी का  वरदान प्राप्त था।भस्मासुर जिस किसी व्यक्ति पर अपना हाथ रख देता था वह भस्म हो जाता था।भस्मासुर ने भ्रमवश स्वयं का हाथ अपने ही सिर पर रख दिया और वह भस्म हो गया।यह पौराणिक कथा है।

वर्तमान में यह कहावत प्रासंगिक लगती है 'जहाँ जहाँ पाँव पड़े संतन के तहाँ तहाँ बंटाधार'

आमजनता को विकल्प का मतलब कार्बन कॉपी नहीं चाहिए।

विपक्ष कोई दल और  विकल्प कोई व्यक्ति नहीं होता है।जनता ही विपक्ष होती है और जनता के बीच से कोई व्यक्ति विकल्प बन कर उभर आता है।

मौजूद स्थिति में भी लगभग साठ प्रतिशत मतदाता विपक्ष के साथ ही है

अफवाहें अंतः अफवाहें ही रहती हैं।यह Rumor spreading society है।यह society  कितनी ही अफवाहों का सर्प बनाकर लोगों को भ्रमित करने की कौशिश करें,हर बार ज्ञानचक्षु खोलने वाले लोग प्रकट होतें ही रहेंगे,और आमजन को यथार्थ से अवगत कराते रहेंगे।


शशिकांत गुप्ते इंदौर