अभिव्यक्ति की आजादी और सोशल मीडिया

भारत सरकार द्वारा लाए गए नए इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस) नियम 2021 के लागू होने के बाद पूरे देश मे हाय - तौबा मचा हुआ हैं , क्योंकि सभी सोशल साइट्स कंपनियों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया हैं। यहाँ तक कि व्हाट्सएप ने तो कोर्ट का भी दरवाजा खटखटा दिया है। सभी कंपनियों द्वारा अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला दिया जा रहा है ।  सरकार का कहना है  कि वह निजता के अधिकार का सम्मान करती है और फ्लैग किए गए मैसेज की शुरुआत का पता लगाने की जरूरत भारत की अखंडता या कानून व्यवस्था से जुड़े बहुत गंभीर अपराध को रोकने और जांच करने के लिए है। आईटी मंत्रालय ने यह भी कहा है कि व्हाट्सऐप ने उसकी इंटरमीडियरी गाइडलाइंस को आखिरी समय पर जिस तरह अदालत में चुनौती दी है, वो नियमों को लागू होने से रोकने की एक दुर्भाग्यपूर्ण कोशिश है।

भारत का संविधान हमें वाक् एवं अभिव्यक्ति की मौलिक आज़ादी के रूप में मौलिक अधिकार देता है। मौलिक अधिकार भारत के संविधान को न ही सिर्फ सुंदर बनाता है बल्कि लोगों को अधिकार दे कर आम जनता तक संविधान को सीधे जोड़ने का भी कार्य करता हैं। आज जबकि  सूचना एवं तकनीकी क्रांति का दौर है इसमें सोशल मीडिया का प्रसार काफी तेजी से हुआ है। इसके तहत आज सोशल साइट का प्रचलन काफी तेजी से बढ़ा है। केंद्र सरकार के अनुसार, भारत में व्हाट्सएप के 53 करोड़, फेसबुक के यूजर 41 करोड़, ट्विटर 1.75 करोड़ , यूट्यूब के 44 करोड़ लगभग यूजर्स हैं। भारत सरकार ने इस साल फरवरी में आई.टी. नियमों को कुछ बदलाव के साथ पेश किया था, जिसमें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के कुछ नए नियम जोड़े गए हैं। सरकार ने इन प्लेटफॉर्म्स को 25 मई तक का वक्त दिया था। नए नियम 26 मई से लागू हो गए हैं, जिसके बाद सरकार नियम न मानने पर इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कानूनी कार्रवाई कर सकती है।

जहां सोशल मीडिया के सकारात्मक उपयोग हैं वहीं इसका नकारात्मक उपयोग सरकार के लिए गले का फ़ांस बन गया है। इससे निपटना सरकार और प्रशासन, दोनों के लिए चुनौती बन गया है। सोशल मीडिया का दुरुपयोग कई रूपों में किया जा रहा है। इसके जरिए न केवल सामाजिक और धार्मिक उन्माद फैलाया जा रहा है बल्कि, राजनीतिक स्वार्थ के लिये भी गलत जानकारियाँ घर-घर परोसी जा रही हैं। इससे समाज में हिंसा को बढ़ावा मिल रहा। सोशल मीडिया की भूमिका सामाजिक समरसता को बिगाड़ने और सकारात्मक सोच की जगह समाज को बाँटने वाली सोच को बढ़ावा देने वाली हो गई है।

विश्व आर्थिक मंच ने भी अपनी जोखिम रिपोर्ट में बताया है कि सोशल मीडिया के ज़रिये झूठी सूचना का प्रसार उभरते जोखिमों में से एक है। लेकिन, सवाल है कि एक प्रगतिशील समाज और देश के लिये यह कितना उचित है कि वह आए दिन गलत सूचनाओं को बनाए और साझा करे? भारत सोशल मीडिया की वज़ह से फैल रही नफरतों से संघर्ष कर रहा है। लेकिन यह भी सच है कि भारत में सोशल मीडिया के ज़रिये कई सकारात्मक पहलों को भी अंजाम दिया गया है। 2011 में अन्ना आंदोलन को मज़बूती और निर्भया कांड के बाद एक सफल आंदोलन इसका सकारात्मक उदाहरण है। लेकिन वर्तमान ने यह गलत इस्तेमाल की वज़हों से सोशल मीडिया ज़्यादा चर्चा में रहने लगा है।

गाइडलाइन के नए प्रावधान: 

सोशल मीडिया पर बेशक सूचनाओं और विचारों का त्वरित आदान-प्रदान हो जाता है, लेकिन इसमें खबरों की सत्यता की पुष्टि अक्सर नहीं होती है। इन सबसे निजात पाने के लिए ही भारत सरकार ने इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस) नियम 2021 में कुछ नए प्रावधान लाए  हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को एक मुख्य अनुपालन अधिकारी की नियुक्ति करनी होगी, जो अधिनियम और नियमों क साथ अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए उत्तरदायी होगा। ऐसा व्यक्ति भारत का निवासी होना चाहिए। कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ 24x7 समन्वयन के लिए एक नोडल संपर्क व्यक्ति की नियुक्ति, ऐसा व्यक्ति भारत का निवासी होगा। इसके अलावे एक रेजीडेंट शिकायत अधिकारी की नियुक्ति करनी होगी, जो शिकायत समाधान तंत्र के अंतर्गत उल्लिखित कामकाज करेगा। ऐसा व्यक्ति भारत का निवासी होगा। एक मासिक अनुपालन रिपोर्ट प्रकाशित करनी होगी, जिसमें मिलने वाली शिकायतों और शिकायतों पर की गई कार्रवाई के साथ ही प्रमुख सोशल मीडिया मध्यस्थों द्वारा तत्परता से हटाए गए कंटेंट के विवरण का उल्लेख करना होगा।

प्राथमिक रूप से संदेश के रूप में सेवाएं दे रहे प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को पहली बार सूचना जारी करने वाले की पहचान में सक्षम बनाना होगा।यानी व्हाट्सएप  जैसे इंस्टैंट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स को किसी मैसेज का ओरिजिन पता करना होगा। 

नए नियम के मुताबिक, भारत की सम्प्रभुता और अखंडता, देश की सुरक्षा, दूसरे देशों के साथ मित्रतापूर्ण संबंधों, या सार्वजनिक आदेश से संबंधित अपराध या उक्त से संबंधित या बलात्कार, यौन सामग्री या बाल यौन शोषण सामग्री से संबंधित सामग्री, जिसमें कम-से-कम पांच साल के कारावास की सजा होती है, से जुड़े अपराधों को बढ़ावा देने वालों पर रोकथाम, पता लगाने, जांच, मुकदमे या सजा के प्रस्ताव के लिए जरूरी है। प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को अपनी वेबसाइट या मोबाइल ऐप या दोनों पर, भारत में अपने ऑफिस का संपर्क पता प्रकाशित करना होगा। यही नहीं, स्वैच्छिक रूप से अपने खातों का वेरिफिकेशन कराने के इच्छुक यूजर्स के खातों के वेरिफिकेशन के लिए एक उचित मैकेनिज्म उपलब्ध कराना होगा और वेरिफिकेशन साइन उपलब्ध कराना होगा।

किसी भी पोस्ट के लिए नियम है कि जब भी किसी प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने अपने हिसाब से किसी जानकारी को हटा दिया है या उस तक पहुंच निष्क्रिय कर दी है। ऐसे में उस जानकारी को साझा करने वाले को इस संबंध में सूचित किया जाएगा, जिसमें इस कार्रवाई का आधार और वजह विस्तार से बताई जाएगी। यूजर्स को प्लेटफॉर्म्स द्वारा की गई कार्रवाई का विरोध करने के लिए पर्याप्त और वाजिब अवसर दिया जाना चाहिए।

अदालत के आदेश के रूप में या अधिकृत अधिकारी के माध्यम से उपयुक्त सरकार या उसकी एजेंसियों द्वारा अधिसूचित की जा रही वास्तविक जानकारी मिलने पर मध्यस्थों द्वारा उसे पोषित या ऐसी कोई जानकारी प्रकाशित नहीं करनी चाहिए जो भारत की सम्प्रभुता और अखंडता, सार्वजनिक आदेश, दूसरे देशों के साथ मित्रवत संबंधों आदि के हित के संबंध में किसी कानून के तहत निषेध हो। ऑनलाइन समाचारों, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और डिजिटल मीडिया के लिए आचार संहिता भी लाया गया है। यह संहिता ओटीटी प्लेटफॉर्म्स, ऑनलाइन समाचार और डिजिटल मीडिया इकाइयों द्वारा पालन किए जाने वाले दिशा-निर्देश सुझाती है।

चिंता का कारण:

आईटी एक्ट 2000 अपने संरचनात्मक स्वरूप में किसी भी प्रकार डिजिटल मीडिया को समाहित नहीं करता। समाचार पत्र, प्रकाशक एवं समाचार तथा समसामयिक विषयों पर केंद्रित सामग्री जैसी अभिव्यक्तियाँ और परिभाषाएं इस एक्ट का हिस्सा नहीं हैं। ऐसी दशा में यह कहाँ तक उचित है कि आईटी एक्ट के दायरे में डिजिटल मीडिया को लाया जाए, जबकि इस हेतु यह निर्मित ही नहीं हुआ है। यह प्रयास इसलिए और भी असंगत लगता है जब हमारे पास डिजिटल मीडिया को नियंत्रित करने के लिए नियमों और प्रक्रियाओं का एक सक्षम ढांचा मौजूद है।

ऐसा प्रतीत होता है कि इन नियमों के क्रियान्वयन के बाद डिजिटल मीडिया से जुड़े मसलों पर निर्णय लेने की न्यायालयीन शक्तियां कार्यपालिका के पास पहुँच जाएंगी और सरकार के चहेते नौकरशाह डिजिटल मीडिया कंटेंट के बारे में फैसला देने लगेंगे। प्रस्तुत अनुदेश में कुछ खामियां भी नजर आ रही है जो कि चिंता का सबब बन सकती हैं। स्रोत बताने को निजता के अधिकार के हनन से जोड़ा जा रहा है जो कि एक मौलिक अधिकार हैं। अवैध करार दिए गए पोस्ट को 36 घण्टे में हटाने को कहा गया है, लेकिन बड़ा सवाल है कि इतनी कम समय में जाँच कर लेना मुश्किल और खर्चीला साबित होगा। यहाँ एक बड़ी समस्या है कि फेक पोस्ट का अंतिम निर्णय सरकार को लेना है। फेक न्यूज को परिभाषित करने का कोई भी अधिकृत प्रावधान नहीं है। इसमें विपक्ष को दबाने का प्रयास किया जा सकता हैं। इसके अलावे सरकार के पूछने पर पोस्ट का प्रथम स्रोत की भी जानकारी देनी होगी और इसका भी अंतिम निर्णय सरकार को करना है। कंपनियों को नए नियम को लागू करने से होने वाली खर्चो से भी समस्या है क्योंकि इससे उनको आर्थिक हानि होगी।

सरकार अनुच्छेद (19)(2) का हवाला दे रही है जिसके अनुसार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से किसी भी तरह देश की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता को नुकसान नहीं होना चाहिए। इन तीन चीजों के संरक्षण के लिए यदि कोई कानून है या बन रहा है, तो उसमें भी बाधा नहीं आनी चाहिए। किंतु यदि ऐसे गंभीर विषयों पर निर्णय सरकार के हित के लिए कार्य करने वाले कुछ नौकरशाह करने लगें और न्यायपालिका की भूमिका लगभग खत्म कर दी जाए तो डिजिटल मीडिया के लिए कार्य करना असंभव हो जाएगा। 

यह जानना आवश्यक है कि यह सारी खुराफात कहाँ से प्रारंभ हुई है। भाजपा का आईटी सेल तो जाहिर है कि इन जहरीली पोस्ट्स से साफ किनारा कर लेगा। फिर हम सच तक कैसे पहुंचेंगे? क्या उन जन चर्चाओं का सत्य कभी भी सामने नहीं आएगा जिनके अनुसार भाजपा के आईटी सेल को जितना हम जानते हैं वह विशाल हिम खण्ड का केवल ऊपर से दिखाई देने वाला हिस्सा है? अब तो प्रत्येक राजनीतिक पार्टी का आईटी सेल है। दुर्भाग्य से अधिकांश राजनीतिक पार्टियां भाजपा को आदर्श मान रही हैं और इनके आईटी सेल नफरत का जवाब नफरत और झूठ का उत्तर झूठ से देने की गलती कर रहे हैं। सारी पार्टियां फेक एकाउंट्स की अधिकतम संख्या के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही हैं, नकली फॉलोवर्स की संख्या के लिए होड़ लगी है। ऐसी दशा में क्या फेसबुक और ट्विटर से सच्चाई सामने आ पाएगी? जब सरकार यह कहती है कि इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के व्यापार का एक बड़ा भाग भारत से होता है और इन्हें भारत के कानून के मुताबिक चलना होगा तो क्या इसमें यह संकेत भी छिपा होता है कि इन प्लेटफॉर्म्स को सरकार के हितों का ध्यान रखना होगा और सत्ता विरोधी कंटेंट से दूरी बनानी होगी?

नियमों के हिसाब से संस्थानों में तो निगरानी की तीन स्तर की व्यवस्था करनी हैं , लेकिन इसके बाद भी सरकार तमाम मंत्रालयों के संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारियों की एक समिति बनायेगी जो मीडिया की शिकायतें सुनेगी। इस समिति की सिफारिश पर सूचना मंत्रालय किसी चैनल या प्लेटफॉर्म को चेतावनी दे सकता है, माफी मांगने को कह सकता है या भूल सुधार करने या सामग्री हटाने को भी कह सकता है। आखिरी फैसला सूचना प्रसारण सचिव के हाथ में होगा। जाहिर है, जब आखिरी फैसला सरकार के हाथ में है, तो उसके हित ही सर्वोपरि होंगे। सरकार अगर वाकई मीडिया की आजादी को बरकरार रखना चाहती है तो उसे इन दिशानिर्देशों को लागू करने से पहले पुनर्विचार करना चाहिए। हालांकि सरकार का दावा अब भी यही है कि वह मीडिया की आजादी पर कोई रोक नहीं लगा रही, लेकिन जिस तरह ये दिशा-निर्देश लाए गए हैं, उनसे सरकार की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि ऐसा करने वाला भारत पहला देश नहीं है। ब्राजील में भी नियम है जिसके तहत सोशल साइट्स को सरकार के मांगने पर सारी सूचना देनी पड़ती है।

दुनियां में आज के दौर में सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को नया आयाम दिया है, आज प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी डर के सोशल मीडिया के माध्यम से अपने विचार रख सकता है और उसे हज़ारों लोगों तक पहुँचा सकता है। अब, जबकि सरकार की नई गाइडलाइन आ चुकी है, देखना यह भी है कि अभिव्यक्ति की आजादी पर आँच आये बिना , निजता के अधिकार का उल्लंघन किये बिना तथा संविधान के मौलिक अधिकार के हनन किए बिना कैसे  सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोका जा रहा है। यह भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है। आम जन के लिए भी ज़रूरी है कि लोग देशहित को प्राथमिकता दें और सोशल मीडिया का बेहतर तरीके से प्रयोग कर दुनिया के सामने भारत की बेहतर तस्वीर पेश करें। भारत 'विश्व गुरु' बनने वाला देश है इसे 'गाली गुरु' या फिर 'नफरत गुरु' न बनाए।

विश्व मे जिस तरह से सोशल साइट्स से भारत सहित अन्य देशों का विवाद हो रहा है। ऐसे में कड़े नियम की देश को आवश्यकता है। लेकिन बड़ा सवाल सरकार की मंशा पर उठती है, जिसके सहयोग से सरकार विरोधियों को दबाने का कार्य कर सकती है । अगर ऐसा होता है तो यह विश्व के सबसे प्राचीन लोकतंत्र के अभिव्यक्ति की आजादी पर सबसे बड़ा प्रहार होगा।


  --- नृपेन्द्र अभिषेक नृप

         छपरा , बिहार