झूंठ के पांव नहीं होते हैं आदरणीय प्रधानमंत्री जी...

आत्मनिर्भरता से आत्मघात की ओर....

(पवन सिंह)

आदरणीय, माननीय, प्रातः वंदनीय, संध्या पूज्यनीय, हे! विष्णु के 11वें अवतार, हे! भारत भाग्यविधाता!!...आपसे करबद्ध अनुनय-विनय है कि कभी तो सच बोलिए प्रभु.... । हे भक्तों के दीनानाथ आपने 'आत्मनिर्भर भारत' का नारा बुलंद किया। आपने कहा था कि आपकी सरकार अन्य देशों पर निर्भरता खत्म कर रही है। अब हर सामान भारत में बनेगा, जो बाहर से मंगवाया जा रहा है। आपने पॉलिसी में तमाम बदलाव कर डाले लेकिन ये क्या???.... आत्मनिर्भरता का नारा तो "पायजामें के नाड़े" से भी कमजोर निकला। कोरोना वायरस की दूसरी लहर में ही आत्मनिर्भरता हवा-हवाई हो गई। हे साक्षात् ईश्वर! आपने तो प्रतिबंध लगाने के बाद चीन से सहायता कुबूल की और आर्डर दे दिए। यही नहीं, 40 से ज्यादा देशों से गिफ्ट और डोनेशन तक कबूल कर लिए।

यह देश का दुर्भाग्य है कि "वाट्सअप विश्वविद्यालय" में "इंटायर पालिटिक्स" की तरह  झूठ की जो डिग्रियां बांटी जा रही हैं, वह तेजी से वायरल हो रही हैं।‌ जब तक सच जूता पहनता है आपका झूंठ पूरी दुनियां में चक्कर लगाकर वापस आ जाता है लेकिन यह भी सच है कि सच, सच ही रहता है। 

पता नहीं आपने मनमोहन सिंह को बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाते हुए देखा या नहीं लेकिन पूरी दुनियां आपको बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाते हुए देख रही है। आपने मनमोहन सिंह की आत्मनिर्भर भारत पॉलिसी को बदल दिया। दिसंबर,  2004 में दक्षिण भारत में सुनामी आई थी। भयावह तबाही हुई लेकिन  तटीय इलाकों में सुनामी ने तबाही मचाई, लेकिन मनमोहन सिंह ने विदेशी मदद की पेशकश ठुकरा दी और कहा हम अपने स्तर पर निपट लेंगे। हां! अगर आवश्यक पड़ी तो  विदेशी सहायता स्वीकार की जाएगी। विदेशी सहायता नहीं ली गई। इसके बाद तीन बड़ी आपदाएं आईं। इसमें वर्ष 2005 के कश्मीर भूकंप, वर्ष,  2013 की उत्तराखंड त्रासदी और साल, 2014 की कश्मीर में भयानक बाढ़, लेकिन भारत सरकार ने विदेशी सहायता स्वीकार नहीं की। वर्ष 2018 में केरल में भयावह बाढ़ आई थी। केरल सरकार ने केंद्र से मदद मांगी थी और यह भी कहा था कि   यूएई 700 करोड़ रुपए मदद देना चाह रहा है लेकिन केंद्र सरकार ने मना कर दिया और अपने स्तर से राहत व पुनर्वास के कार्य एक योजनाबद्ध तरीके से किए । केरल जल्दी ही विभीषिका से उबर गया। इन घटनाओं से विदेशों में भारत की गजब की छवि बनी।

इसके बाद आए भारत भाग्यविधाता, हिंदू हृदय सम्राट 76 साल के युवा तुर्क और समस्त विद्याओं व विद्याओं के सर्व ज्ञाता जी और उन्होंने एक नारा फेंका आत्मनिर्भर भारत का। फिर भारत कैसै आत्मनिर्भर हुआ उसकी बानगी देखिए-चीनी ऐप बंद करके और "भारतीय रीढ़ टूट मीडिया" में चीनी अर्थव्यवस्था को तहस नहस  करने की खबरें चलवाने वाले साहेब ने अंततः कोरोना की दूसरी लहर में ही हथियार डाल दिए। आक्सीजन वह जीवन रक्षक दवाओं की खरीदी के लिए वैचारिक सहमति हो गई। भारत में चीनी राजदूत सुन विडोंग ने सोशल मीडिया पर इस बात की पुष्टि की और कहा कि चीनी मेडिकल सप्लायर्स भारत से मिले ऑर्डर को पूरा करने के लिए ओवरटाइम कर रहे हैं। कम से कम 25 हजार ऑक्सीजन कंसंट्रेटर के ऑर्डर उन्हें मिले हैं। कार्गो प्लेन मेडिकल सप्लाई लेकर उड़ चुके हैं। 25 अप्रैल, 2021 को चीन से  पहली मदद भारत आ गई लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि सहायता राज्यों तक नहीं पहुंच सकी।दिल्ली एयरपोर्ट के प्रवक्ता के अनुसार 28 अप्रैल से 2 मई के बीच 300 टन राहत सामग्री पहुंची। पर वह सही जगह नहीं पहुंच सकी। जब राज्यों ने हल्ला मचाया तो वितरण कैसे होगा इस पर फैसला 3 मई, 2021 की शाम को हो पाया । 

हां! पाकिस्तान से मदद ली जाए या नहीं, इस पर सरकार विचार कर रही है। पहली लहर में सारे रसगुल्ले खाने वाले साहेब ने दूसरी लहर में राज्य सरकारों को अधिकृत कर दिया कि विदेशों से टेस्टिंग किट व दवाएं तक खरीद लें। आत्मनिर्भर भारत सरकार ने कोरोना वायरस की दूसरी लहर में ही तमाम देशों से दवाएं, उपकरण, डोनेशन, आक्सीजन......सब स्वीकार कर लिया। वर्ष 2004 के बाद ऐसा आत्मनिर्भर भारत में हुआ। विश्व के 40 देशों ने आत्मनिर्भर भारत को मदद की पेशकश की है। इसमें भूटान, श्री लंका, बांग्लादेश, कजाकिस्तान, पाकिस्तान के अलावा अमेरिका, यूके, फ्रांस, जर्मनी, रूस, आयरलैंड, बेल्जियम, रोमानिया, लक्जमबर्ग, पुर्तगाल, स्वीडन, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर, सऊदी अरब, हांगकांग, न्यूजीलैंड, मॉरीशस, थाईलैंड, फिनलैंड, स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, इटली और UAE शामिल हैं। पाकिस्तान को छोड़कर तमाम देशों से तो राहत सामग्री आ गई है या पहुंचने वाली है। भूटान आक्सीजन दे रहा है और श्रीलंका के बौद्ध भिक्षु भारत के लिए विशेष प्रार्थना कर रहे हैं।

काश! आत्मनिर्भर भारत चिकित्सा वैज्ञानिकों व वायरोलाजिस्टों की चेतावनी को गंभीरता से लेता। आत्ममुग्ध भारत भाग्यविधाता 150 देशों की मदद करने का हास्यास्पद नगाड़ा न पीटते तो शायद आज हम गर्व से अपने ही संसाधनों के सहारे इससे लड़ रहे होते और विश्व में सिर भी ऊंचा रहता। काश इस देश का रीढ़टूट धूलधूसरित मीडिया "आत्मनिर्भर परमात्मा" की आंख में आंख डालकर बात कर रहे होते तो लाखों जाने नहीं जातीं। इसके बावजूद इस देश के एक बड़े वर्ग की आंखें अभी भी नहीं खुली हैं तो वो और इंतजार कर सकते हैं क्योंकि झूठ-झूठ होता है, लेकिन सच रेडियम है चमकता रहेगा। कपड़े उतार कर चौराहे पर खड़े होकर अपनी आंखें बंद किए हुए लोग अभी भी यह सोच रहे हैं कि उन्हें कोई देख नहीं रहा है।