प्यारे पापाजी

हौसला है जिनसे

जो घर की बुनियाद है 

बचपन की यादों में, 

उन हाथों का एहसास है

मेरे बढ़ते कदम 

सिर्फ, आपके संकल्प को

देखते है पापाजी 

थोड़ा सा गिर गया हूँ 

फिर से उठा लो मुझे पापाजी


बिना पैर से चलने वाली, 

उस साइकिल को खोजता हूँ 

मोहल्ले की गलियों में, 

उस आवाज को खोजता हूँ 

बढ़ तो गया 

कहा जैसा तुमने पापाजी 

थोड़ा सा गिर गया हूँ 

फिर से मुझे उठा लो पापाजी


हिम्मत दिलाती डांट वो 

कब मुस्कराहट बन गयी 

जिंदगी मेरे लिए अब 

आहट तुम्हारी बन गयी 

वो सपनो में भी अपना 

बचपन तलाशता हूँ पापाजी 

थोड़ा सा गिर गया हूँ 

फिर से उठा लो मुझे पापाजी 


छाँव में तुम्हारी बन गया 

उठ गया में अभिमानी 

मंजिल तो पा गया पर 

राह पकड़ी अनजानी 

सोया हूँ तुम्हारी बगिया में 

जगा दो मुझे पापाजी 

थोड़ा सा गिर गया हूँ 

फिर से उठा लो मुझे पापाजी 


-कवि डॉ . अखिलेश जैन 

पलमोनोलॉजिस्ट एवं चेस्ट फिजिशियन

सागर मध्यप्रदेश