बोर्ड परीक्षाओं को लेकर केंद्र सरकार का फैसला सही या गलत

इतने लंबे अंतराल के बाद देश भर में पेंडिंग कक्षा 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं को लेकर आख़िर केंद्र सरकार का फैसला आ ही गया।

विभिन्न राज्य सरकारों एवम प्रख्यात और अनुभवी शिक्षाविदों द्वारा दिए गए सुझावों को मद्देनजर रखते हुए केंद्र सरकार ने निर्णय लिया है कि लंबे समय से स्थगित बोर्ड परीक्षाएं अवश्य होंगी।साथ ही

सरकार ने साफ़ भी किया है कि ये परीक्षा सभी छात्र अपने ही विद्यालयों में ऑफलाइन मोड पर जाकर दे सकते हैं।गौरतलब है कि परीक्षाओं की समय अवधि 3 घंटे से घटाकर  डेढ़ घंटे करने एवम परीक्षा प्रश्न पत्र के पैटर्न  में भी बदलाव कर केवल वस्तुनिष्ठ प्रश्नों को ही प्राथमिकता देने का ऐलान केंद्र सरकार ने सभी राज्यों के शिक्षा मंत्रियों के साथ की गई अति महत्वपूर्ण मीटिंग में किया है।यह मीटिंग माननीय रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह जी की अध्यक्षता में 23 मई,2021 को संपन्न हुई।

 विश्व के सबसे बड़े एजुकेशन सिस्टम के सामने इस बार बोर्ड परीक्षाओं को नए पैटर्न पर संपन्न करवाने की खासी चुनौती है जिसमें न केवल परीक्षा में बैठने वाले छात्रों अपितु परीक्षा लेने एवम उत्तर पुस्तिका जांचने तथा परीक्षा परिणाम तैयार करने वाले अध्यापकों एवम बाकी हेल्पिंग स्टाफ के स्वास्थ्य को भी ध्यान में रखना होगा ताकि वे अपनी ड्यूटी बेखौंफ बिना संक्रमित हुए दे पाएं।

ध्यान देने वाली बात यह है कि क्या बोर्ड द्वारा सभी ज़रूरी एवम सुरक्षा के पुख़्ता इंतजाम करने के बाद यह गारंटी दी जा सकती है कि परीक्षार्थी एवम अध्यापक गण आग की तरह फैल रहे कोरोना की चपेट में नहीं आएंगे,क्या वे खुद को संक्रमित होने से बचा पाएंगे??

क्या सरकार उन सभी की जिंदगी की गारंटी लेगी जो इन परीक्षाओं से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी भी प्रकार से जुड़ेंगे ??

क्या सरकार परीक्षाओं से पूर्व परीक्षा में बैठने वाले देश भर के लगभग डेढ़ करोड़ छात्रों का सफलतापूर्वक टीकाकरण कर पाएगी??

इन सभी प्रश्नों के जवाब आज उन सभी छात्रों ,उनके अभिभावकों, अध्यापकों एवम बाल कल्याण से जुड़ी विभिन्न संस्थाओं के कार्यकर्ताओं के मन में उठ रहे हैं जो शायद परीक्षाओं से ज्यादा तरजीह मासूम बच्चों की जिंदगी को देते हैं क्योंकि यही बच्चे हमारे आने वाले कल का भविष्य साबित होंगे।

एक बार को परीक्षाएं यदि ऑनलाइन मोड पर ली जाती तो भी शायद छात्रों पर मानसिक दबाव कुछ काम होता क्योंकि पिछले एक साल से सभी छात्र ऑनलाइन परीक्षा के तौर तरीकों के भली प्रकार अभ्यस्त हो चुके हैं।परंतु निर्णय तो सरकार ने ऑफलाइन तरीके से घर से बाहर विद्यालय आकर परीक्षा देने का लिया है।

यहां सोचने वाली बात यह है कि सहमा डरा बचपन जब परीक्षा केंद्र में भयभीत होकर प्रवेश करेगा तो अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वह परीक्षा किस मन:स्थिति में देगा।साथ ही बिना इच्छा के नौकरी जाने के डर से मजबूरन ड्यूटी दे रहे स्टाफ सदस्य भी शायद निर्भीक होकर अपनी जिम्मेदारी उतने अच्छे से और निष्ठापूर्वक तरीके से नहीं निभा पाएंगे क्योंकि संक्रमण का खतरा चाहे अनचाहे उनके दिमाग पर उस वक्त अवश्य मंडरा रहा होगा।

कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार छात्रों का हित करने की सोच रखकर उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए वर्तमान में उनके स्वास्थ्य एवम उनके जीवन को ताक पर रख रही है। निसंदेह सरकार देश के होनहारों का भला ही चाहती है,परंतु कभी कभी ज्यादा अच्छा करने के चक्कर में कुछ ऐसी चूक हो जाती हैं जिनकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती।इसलिए अभी भी वक्त है,सरकार को अपने निर्णय पर पुन: विचार करना चाहिए एवम देश के कर्णधारों के स्वास्थ्य एवम जीवन दोनों को प्राथमिकता पर रखकर ही कोई नया निर्णय लेना चाहिए।

पिंकी सिंघल

अध्यापिका

शालीमार बाग दिल्ली