कोरोना 2020 कर्म और ईश्वर

सन 2020 लोगों को खुशियों से कहीं ज्यादा परेशानियां लेकर आया।सबसे ज्यादा परेशान किया चीन से आए कोरोनावायरस ने। इस महामारी ने देश ही नहीं विश्व को हिला दिया। बहुत लोगों को ईश्वर और कर्म की बात करते हुए सुना है।जब भी किसी को समस्या हुई लोग कहने लगते हैं।कर्म की बात है।अधिकतर कर्म  की बात करते हैं और यह भी  कहते हैं ईश्वर की पूजा सच्चे मन से नहीं करता होगा। कोरोनावायरस आर्थिक  और सामाजिक अध्ययन से भरा है।ईश्वर की आस्था और कर्म के अध्ययन से भरा है। यह कोरोना अनेक  तथ्यों को परिभाषित करता रहा है।

महामारी  से अलग जब किसी को कोई बीमारी हुई या समस्या तो लोग कई तरह की बातें करते हैं।लेकिन कोरोना काल  में ऐसे लोगों को भी बहुत बुरे दिन देखने पड़े जिन्होंने अनेकों  दान किए और सुबह शाम ईश्वर की पूजा और प्रार्थना की अपने धर्म के अनुसार।

कीर्तन भजन अनेक तरह से ईश्वर को याद किया। पर कोरोनावायरस ने नहीं देखा कौन कमजोर है। कौन मजबूत है।कौन गरीब है।कौन अमीर है।कौन सुंदर है।कौन बदसूरत है।ऐसा उसने कुछ भी नहीं देखा।कौन बड़े पद वाला है।कौन छोटे पद वाला है।उसने किसी को भी शिकार बनाया।

अनेक डॉक्टर जो दिन रात कोरोना काल में  सेवाएं दे रहे थे कितनों को शिकार बनाया। 🌿

कोरोना वायरस के प्रभाव में कई पूजा पाठ करने वाले और न पूजा पाठ करने वाले लोगों का मैंने अध्ययन किया।क्योंकि लोग कर्म और ईश्वर की बात करते हैँ।कोरोना ने आस्तिक और नास्तिक सामाजिक और असमाजिक सभी को काटा। वहीं समाजसेवी दिल्ली निवासी स्वर्गीय श्री बीरबल शर्मा जी का अध्ययन किया क्योंकि  मैं कई साल से उनके बारे में जान रही थी। ईश्वर को वह नहीं मानते थे।lकार्ल मार्क्स के अनुयाई थे। वह समाज सेवा मानव कल्याण को सर्वोपरि मानते थे।उनका कहना था कि मृत्यु में बहुत विभिन्नता है lकिसी को कफन तक नहीं मिलता।

 तो  किसी का दाह संस्कार पूरा नहीं होता। किसी को बारात सी विदाई दी जाती है।

ईश्वर ऐसा क्यों करता है।जब  उनसे कहा जाता कि कर्मों का फल है तो वह कई अच्छे कर्म वाले लोगों के नाम गिना देते कि इनकी मौत दर्दनाक क्यों हुई? 

इनके साथ अन्याय क्यों हुआ? लेकिन स्वयं पूजा पाठ नहीं करते थे।lपर किसी को रोकते नहीं थे। न ही वह प्रसाद लेने से मना करते थे  तथा हवन व्रत किसी भी कार्य के लिए घर में या बाहर किसी को मना नहीं करते थे।

वह  लिमिटेड कंपनी से रिटायर होने के बाद पैसे या जरूरतमंद लोगों की उनके साथ जाकर उनके खर्चो में रियायत कराते थे।

वह मानव कल्याण में विश्वास करते थे।अनजान लोगों की मदद करते थे और जानकार लोगों के लिए किसी भी समय हर तरह से तैयार रहते थे। चाहे अस्पताल जाने का कार्य हो या अन्य कोई कार्य हो।किसी छात्र छात्रा का कार्य हो या अन्य कोई कार्य हो।  लोग उनके लिए बाबू जी, पिताजी और अंकल कहकर पुकारते थे।

हमेशा वह सेवा के लिए तैयार रहते थे। उन्होंने ईश्वर को कभी नहीं माना।कार्ल मार्क्स की पुस्तकें पढ़ते रहते थे और कार्ल मार्क्स के बारे में अधिकतर बात करते थे।

वह विद्वान व्यक्ति थे।राजनीति का ज्ञान था और वह अक्सर अपने मित्रों के साथ बैठकर राजनीति के बारे में बातें किया करते थे और कई मुद्दों के बारे में बातें करते थे। राजनीति में आना  कभी पसंद नहीं किया क्योंकि कहते थे राजनीति बदल चुकी है । किसी को बुरा लगे या भला स्पष्ट कहते थे ।कोई व्यक्ति चाहे कितना भी करोड़पति हो लेकिन कई बार सेवा में दिक्कत आती  है। लेकिन फिर भी उनकी सेवा बहुत अच्छी हुई और ईश्वर को न मानने वाले रहे और उन्होंने कभी ईश्वर को याद ही नहीं किया। लेकिन किसी को रोका भी नहीं।उनकी 90 वर्ष की आयु पूरी हुई पूर्ण सेवा के साथ और आश्चर्य की बात है उनकी मृत्यु कोरोना  से नहीं हुई।लेकिन ऐसे में 25 नवंबर 2020 देवोठान के दिन उनकी मृत्यु हुई । जब कि  कोरोनावायरस फैला  हुआ था। पत्नी और उनकी मृत्यु तिथि एकादशी एक सी हुई । बिना पूजा के भी ऐसा हुआ ।

चिकित्सक भी उनकी उनका इतना ख्याल रखते थे।घर पर सेवा मिलती थी।आवश्यक होने पर ही अस्पताल ले जाया जाता था।अपनी मर्जी की जिंदगी जीने वाले व्यक्ति के  चिकित्सक के हाथों में प्राण निकलते हैं और वह भी उस दिन चलते फिरते हुए। वह  भी अपने संबंधियों से सामने और फोन पर बात करने के बाद।

न कोई दर्द महसूस हुआ और न ही प्राण निकलने में कोई मुश्किल हुई। मृत्यु के समय उनका विमान बनाया गया।

अंतिम समय में उन्होंने यह नहीं बताया कि दाह संस्कार के अलावा अन्य संस्कार किये जाएं या नहीं तो सभी कार्य भी उनके अच्छी तरह से किये गए ।

मैंने इस बात की जानकारी ली कि उन्होंने ईश्वर का नाम अंत में भी नहीं लिया।वह किसी का भला करते तो उससे भी कहते वह किसी का भला करे ।

इस सबसे मुझे ज्ञात हुआ है कि वास्तव में ईश्वर यह नहीं चाहता कि हम माला जपते रहें  बल्कि ईश्वर मानव कल्याण चाहता है।हर आत्मा परमात्मा का अंश है।किसी का दिल न दुखाना और मदद करना ईश्वर को प्रसन्न करने का एक माध्यम है।

पूनम पाठक बदायूँ