नवरात्रि पर्व दुर्गा पूजा हिन्दू/सनातन धर्म का त्योहार है

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

पौराणिक महत्व का माँ दुर्गा की शक्ति की पूजा अर्थात नवरात्रि में दुर्गा पूजा का पर्व हिन्दू देवी माँ दुर्गा जी की बुराई के प्रतीक महिषासुर राक्षस पर विजय प्राप्त करने के रूप में मनाया जाता है।

या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

मान्यता है कि बहुत समय पहले देवताओं और असुरों के बीच स्वर्ग को लेकर युद्ध होता रहता था। दोनों ही स्वर्ग पर अपना अधिकार जताते रहते थे। जब भी युद्ध होता था तो देवताओं द्वारा असुरों को हराने के लिए कोई न कोई एक उपाय अवश्य ही निकाल लेते थे। इस बात से महिषासुर नामक असुर (राक्षस) बहुत परेशान रहता था। इस लिए एक बार उसने भगवान ब्रम्हा जी की कड़ी तपस्या प्रारम्भ कर दिया। ब्रम्हा जी उसकी इतनी कठिन तपस्या से प्रसन्न हो कर महिषासुर से वरदान मांगने को कहा। महिषासुर ने ब्रम्हा जी से कहा कि मुझे अमरता का वरदान दीजिये प्रभू।

जिससे मेरी मृत्यु न हो,कोई भी देवता मुझे जीवन में पराजित न कर सकें। ब्रम्हा जी ने उससे कहा कि मैं तुम्हें अमरता तो प्रदान नहीं कर सकता किन्तु इतना जरूर कर सकता हूँ कि तुम्हारी मृत्यु किसी देवता या पुरुष के हाथों न हो बल्कि तुम्हारी मृत्यु किसी स्त्री के हाथों हो। महिषासुर यह सुन कर भी बहुत प्रसन्न हो गया और ब्रह्मा जी के इस वरदान को स्वीकार कर लिया। उसने अनुमान लगाया कि ऐसी कोई स्त्री दुनिया में नहीं है जो मुझसे वलिष्ठ हो या जो मुझे हरा सके या

मुझे मार सके।

जैसा की असुर हमेशा करते थे,वरदान पाकर निश्चिन्त हो जाते और देवताओं पर चढ़ाई कर देते। महिषासुर ने भी वैसा ही किया,जल्द ही सभी देवताओं पर बहुत बड़ी विपदा आन पड़ी। सभी देवता भगवान त्रिदेव के पास अपनी इस विषम समस्या और संकट को लेकर पहुंचे। इस घोर संकट से देवताओं को निजात दिलाने हेतु भगवान ब्रह्मा ,विष्णु और महेश ने अपनी शक्तियों से शक्ति का रूप,शक्ति की देवी माँ दुर्गा को उत्पन्न किया और उनसे महिषासुर राक्षस का संहार भी करने को कहा। अब महिषासुर राक्षस और माता दुर्गा में कई दिन भयंकर युद्ध चला। इस युद्ध के परिणाम स्वरुप आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को माँ दुर्गा ने महिषासुर को मार गिराया।

तभी से इस दिन को बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में उत्सव और शक्ति की उपासना के पर्व के रूप में मनाया जाता है। इसी लिए दुर्गा माँ का यह एक रूप एवं नाम महिषासुर मर्दिनी भी है।

अस्तु दुर्गा पूजा का पर्व बुराई पर भलाई की जीत के रूप में मनाया जाता है। यह न केवल हिंदुओं का एक सब से बड़ा उत्सव है बल्कि बंगाली हिन्दू समाज में भी एक सब से बड़े विशाल हर्षोल्लाष का पर्व है। दुर्गा पूजा का यह महान वैभवशाली पर्व सांस्कृतिक-सामाजिक रूप से एवं सनातन दृष्टिकोण से भी सब से महत्वपूर्ण एक उत्सव है।

दुर्गा पूजा भारतीय राज्यों में विशेषकर आसाम, बिहार,झारखण्ड,मणिपुर,उड़ीसा,त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में बहुत व्यापक रूप से मनाया जाता है,जहाँ इसे मानाने के लिए इस समय पाँच दिनों की वार्षिक छुट्टी भी रहती है। बंगाली हिन्दुओं और असामी हिन्दुओं के बाहुल्य वाले क्षेत्रों में यह त्योहार वर्ष का सब से बड़ा उत्सव माना जाता है,और इसे बड़े धूम धाम से मनाया जाता है। यह वर्ष में 2 बार आता है। एक बार शरद ऋतु में शारदीय नवरात्रि के रूप में मनाया जाता है,उसके बाद दशहरा पर्व होता है और एक बार चैत्र नवरात्रि के रूप में मनाया जाता है उसके बाद दशवे दिन भगवान श्रीराम का जन्म दिवस राम नवमी पर्व बड़े धूम धाम से मनाया जाता है।

यद्यपि कि इस बार पुनः कोरोना के बढ़ते संक्रमण व विस्तार के चलते 2921 में भी सरकार ने कुछ पावंदियों के साथ ही मंदिर में जाने की छूट दी है।

जिससे भीड़ न जमा हो और लोगों को कोई भी दिक्कत व परेशानी भी न हो।

पश्चिमी भारत के अतिरिक्त भी दुर्गा पूजा का यह उत्सव दिल्ली,उत्तर प्रदेश,महाराष्ट्र,गुजरात,पंजाब

,काश्मीर,आंध्र प्रदेश,कर्नाटक और केरल में भी बड़े जोर शोर से मनाया जाता है। दुर्गा पूजा एक ऐसा त्योहार है जिसे सर्वाधिक हिन्दू आबादी 91 % वाले नेपाल और सब से कम हिन्दू आबादी 8 प्रतिशत वाले बंगला देश में भी बड़े त्योहार के रूप में हर्षोल्लाष के साथ मनाया जाता है।

वर्तमान समय में तो यह दुर्गा पूजा विभिन्न प्रवासी

असामी और बंगाली सांस्कृतिक संगठन,संयुक्त राज्य अमेरिका,कनाडा,यूनाइटेड किंगडम,फ़्रांस,

ऑस्ट्रेलिया,जर्मनी,नीदरलैंड,सिंगापुर और कुवैत सहित विभिन्न देशों में भी आयोजित करवाये जाते हैं। माता रानी के इस त्योहार विशाल दुर्गा पूजा को ब्रिटिश संग्रहालय में भी 2006 में उत्सव पूर्वक आयोजित किया गया था। दुर्गा पूजा की इतनी ख्याति ब्रिटिश राज्य में अंग्रेजों के शासन में बंगाल और भूतपूर्व असम में धीरे धीरे बढ़ी। हिन्दू सुधारकों ने देवी माँ दुर्गा को भारत में पहचान दिलाई और इसे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलनों का प्रतीक भी बनाया।

हिन्दू धर्म में अनेक देवी देवताओं की पूजा की जाती है। वह भी अलग अलग क्षेत्रों में अलग अलग देवी देवताओं की पूजा उस क्षेत्र विशेष की मान्यता और परंपरा के अनुसार की जाती रही है और बड़े धूम धाम से उत्सव पूर्वक की जाती है। उत्तर भारत में जहाँ सावन व फाल्गुन माह में कावड़ यात्रा पूरे माह भर और महा शिवरात्रि पर्व कई दिनों तक मनाया जाता है वहीं भाद्रपद माह में महाराष्ट्र में गणेशोत्सव की महाधूम रहती है,यह त्योहार बड़े उत्साह से मनाया जाता है।यद्यपि कि इस बार गणेशोत्सव और शारदीय नवरात्रि में भी यह त्योहार कोरोना संक्रमण के कारण सरकार ने इसे घर में मनाने की इजाजत दी है,मंदिर नहीं खोला गया था। इसी तरह गुजरात,राजस्थान और लगभग पूरे उत्तर भारत में ही वर्ष में दो बार जहाँ चैत्र और आश्विन माह में नवरात्रि पूजा का बड़े धूमधाम से उत्साहपूर्वक आयोजन किया जाता है,तो वहीं बंगाली क्षेत्र में आश्विन माह के शुक्ल पक्ष में षष्ठी तिथि से दशमी तिथि तक पाँच दिनों तक दुर्गा पूजा पर्व का उत्सव बड़े हर्षोल्लाष के साथ मनाया जाता है। इन प्रतिमाओं/मूर्तियों का विसर्जन भी जैसे दस दिनों के पश्चात आदर व श्रद्धा पूर्वक गणेशोतोत्सव के बाद किया जाता है,वैसे ही दुर्गा पूजा के बाद माँ दुर्गा की विभिन्न प्रतिमाओं/मूर्तियों का भी बड़े आदर व सम्मान के साथ विसर्जन किया जाता है।

सच पूछा जाय तो दुर्गापूजा का यह प्रसिद्ध उत्सव और त्योहार तो पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा आदि राज्यों में है,किन्तु वर्तमान समय में दुर्गा पूजा का यह उत्सव लगभग पूरे देश में ही मनाया जाता है।

शारदीय नवरात्रि में तो दुर्गा पूजा की तैयारियां लगभग महीने भर पहले से ही शुरू हो जाती है। इस पर्व में पंडाल लगाकर इसे विधिवत सजाया जाता है और इसमें माता रानी दुर्गा माँ के अलग अलग रूपों की दुर्गा माँ की प्रतिमाओं को बड़े ही विधि विधान से पूजन कर स्थापित किया जाता है। इस अवसर पर पांडालों में स्थापित सभी प्रतिमाओं का एक कमेटी द्वारा विधिवत आंकलन भी किया जाता है तथा सर्वश्रेष्ठ सजावट,श्रेष्ठ व्यवस्था,सबसे बेहतर प्रतिमा,सब से अधिक रचनात्मक कार्यों के लिए पांडाल के व्यस्थापकों को पुरष्कृत भी किया जाता है। इस अवसर पर विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों और प्रतियोगिताओं का आयोजन भी किया जाता है। पुरुष एवं महिलाएं अपने क्षेत्र के पारंपरिक परिधान पहनते हैं। यह भी मान्यता है कि राजा-महाराजाओं के समय में तो यह दुर्गा पूजा और भी अधिक जोश और उत्साह से बड़े स्तर पर हमेशा आयोजित की जाती रही है।

इस दुर्गा पूजा त्योहार में कलश स्थापना से लेकर नौमी तक हिन्दू धर्म के श्रद्धालु और भक्तगण व्रत और उपवास रखते हैं। इस व्रत में बहुत से लोग तो पूरा नौ दिन सिर्फ फलाहार,मेवा,दूध,दही,सिंघाड़े के आटे से बनी खाद्य सामग्री और बिना लहसुन प्याज की सब्जी आदि केवल खाते हैं और माता रानी का दोनों समय दुर्गा के नौ रूपों की हर दिन के हिसाब से उनकी पूजा अर्चना कीर्तन भजन करते हैं और अंतिम दिवस नवमी को हवन पूजन प्रसाद वितरण करने के बाद अन्न को ग्रहण करते हैं। कुछ लोग केवल स्थापना दिवस और अष्टमी को ही व्रत रहते हैं और माँ दुर्गा का पूजा पाठ और हवन तथा आरती इत्यादि करते हैं। अब जब शरीर की शक्ति और ऊर्जा कम हो रही रहती है तब भी माँ के श्रद्धा के प्रति व्रत इत्यादि रहते हैं। माता की पूजा अर्चना और मंदिरों में नवरात्रि में दर्शन करने और चढ़ावा चढ़ाने भी जाते हैं। माता रानी सब की मनोकामना पूर्ण करती हैं और सब पर अपनी कृपा बरसाती हैं। देवी माँ दुर्गा सब का मंगल करती हैं और दुष्टों का संघार भी करती हैं।

जय माता दी।

या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

जय माता दी,जय माता दी,जय माता दी

लेखक :

डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव

वरिष्ठ प्रवक्ता-पी बी कालेज,प्रतापगढ़ सिटी,उ.प्र.

इंटरनेशनल एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर-नार्थ इंडिया

2020-21,एलायन्स क्लब्स इंटरनेशनल,प.बंगाल

संपर्क : 9415350596