"इस महामारी के वक्त में क्रिकेट जरूरी की मरिज़ों का इलाज"

ओस्ट्रेलियन क्रिकेटर एंड्रयू टाय ने ये कहते हुए आइ पी एल लीग से लिव ले लिया की जहाँ भारत में इतनी महामारी के बीच लोगों को दवाई, ऑक्सीजन और बेड नहीं मिल रहे ऐसे में स्पांसर कंपनियां इतने रुपए क्रिकेट पर कैसे लगा सकती है। हम विदेशीयों को क्या-क्या बोलते रहते है, उनकी संस्कृति के बारे में टिप्पणी करते रहते है। पर आज जहाँ हमारे देश वालों के दिल में ये सुविचार नहीं आया वहाँ एक विदेशी ने अपनी संवेदना जता दी। 

जो कंपनियां करोडों रुपयें खेल पर लगा रही है वो एक साल के लिए मुनाफ़े को भूलकर अगर वो पैसे मरिज़ों की सुविधा के लिए लगाती तो कई घरों में उजाला बना रहता। अगर आपको ईश्वर ने उस काबिल बनाया है कि आप अपने हिस्से में से किसी जरूरतमंद की मदद कर सकें तो हाथ कभी तंग नहीं रखने चाहिए ।आज हमारे देश में करोड़ों लोग आर्थिक रुप से सक्षम न होने की वजह सै दवाई और दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहे है। ऐसे में ये बड़ी कंपनियां खेल पर पैसे लूटा रही है एक साल क्रिकेट बंद रहेगा तो कौनसा पहाड़ टूट पड़ेगा। उन पैसों को इस महामारी रोकने में लगाते तो कई लोगों की जान बच जाती।

साथ ही यहाँ धार्मिक संस्थाओं की बात करें तो खर्वों रुपये पड़े है उनकी तिजोरियों में, सरकार को कुछ नियम बनाकर वो रुपये निकलवाने चाहिए। बड़े बड़े हाॅल और धर्मशालाओं को अस्पताल में तब्दील करवा कर चिकित्सा के सारे इन्तज़ाम हो सकते है। इस महामारी के समय में लोगों को मदद की जरूरत है। लोगों ने ही दान धर्म के नाम पर दिए है। बेड, दवाई और ऑक्सीजन की कमी की वजह से कितने लोगों ने साँसों से नाता तोड़ लिया। एक मरिज़ हमारे लिए एक केस मात्र है, पर वह मरिज़ एक परिवार का आधार स्तंभ होता है। उस इंसान की अपूरणीय क्षति पूरे परिवार को बिखेर देती है। 

ये समय इंसानियत निभाने का है मुनाफ़ा देखने का नहीं। मुकेश अंबानी और रतन टाटा जैसे दानवीर आगे आए भी है अपनी तिजोरी को खोलकर वो तो देश पर आए हर संकट में अपना योगदान देते ही है, यहाँ नाम नहीं देंगे पर बहुत सारे रईश ऐसे समय में अंडर ग्राउंड हो जाते है। खाली हाथ आए थे खाली हाथ जाना है चार कर्म अच्छे ही साथ आने है तो खुद के हाथों दूसरों की मदद करके खुद का उद्धार क्यूँ न कर लें।

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु