कर्म भूमि

नींद आंखों से कोसों दूर है,

तरसता हुआ ह्रदय मजबूर है।
दिनभर अपनी कर्मभूमि पर,
रगड़ते हुए पांवों के निशान पर।
फटी एड़ियों की पीड़ा सहते,
पसीने से नहाकर धारा बहते।
आईने में सूरत भी न देख सके,
फुर्सत कहाँ के कुछ कर सकें।
रोजमर्रा की   दौड़ा भागी में,
बीती जाए उम्र आपाधापी में।
खो गई चेहरे की वो चमक,
बुझ गई रिश्ते की भी दमक।
मेरे अपने भी न देखना चाहे मुझे,
अब तो आईना भी है मुंह फेरे।
गुज़र रही जिंदगी बस यूँही,
कुछ पल को सांसे हैं थमी।

डा0शीला चतुर्वेदी,यस आर जी,
बेसिक शिक्षा परिषद,देवरिया,उ0प्र0