डायपर

    शहर में म्युनिसिपैलिटी की हड़ताल से कॉलोनी की मोड़ पर लगा एक पुराना कचरे का डब्बा लगातार ठूँसे जा रहे कचरे से त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहा था। उसकी अंतरात्मा चीख-पुकार मचा रही थी, "हे प्रभु! मुझे इस कचरे से मुक्ति दो या फिर मुझे कचरे के डब्बे के जीवन से। अब और नहीं सहा जाता।"

    उसके अंदर पड़ा सड़ता हुआ कूड़ा, जो कि जाने किन-किन चीजों का समावेश बना बदबू मार रहा था चिढ़कर बोला, "तुम तो फिर भी बाहर हो और हवा खा रहे हो। हमारी दुर्दशा सोचो, जो यहाँ ठंसे पड़े हैं। बनते हुए मीथेन गैस से हमारा दम घुट रहा है। लोगों में जागरूकता आने से प्लास्टिक का कचरा तो थोड़ा कम हुआ है पर दो प्रकार के कूड़े से हमें कभी मुक्ति नहीं मिलने वाली, एक सेनेटरी नैपकिन का कचरा और दूसरा बेबी डायपर्स का, जो सालों-साल सड़ने का नाम नहीं लेते। पढ़े-लिखे लोग अब प्लास्टिक का उपयोग भले थोड़ा कम करने लगे हों, पर डायपर का कचरा बढ़ता ही जा रहा है।"

    सेनेटरी नैपकिन का कचरा बोला, "भाई! वर्षों से हम जितने थे उतने ही अभी भी होंगे। माना कि गंदगी की जड़ हैं हम, पर हम एक तरह से महिलाओं की मजबूरी हैं, स्वच्छता एवं बीमारी से बचने का साधन भी हैं। पर बेबी डायपर्स का कचरा जो दिन दूना रात चौगुना बढ़ रहा है उसका कारण ठीक से समझ में नहीं आता।"

  कचरे का डब्बा बोला, "क्या कहा जाए भाई, आजकल की कामकाजी माताएँ, नानियाँ और दादियाँ। कामकाजी होने के साथ-साथ उनका मानना कि कपड़े गंदे नहीं होने चाहिए, यही इन बातों की जड़ में है। उन्हें लगता है बेबी पाउडर और डायपर रैश क्रीम लगाने से बच्चे की त्वचा को हुए नुकसान की भरपाई हो जाएगी। डायपर का इस्तेमाल कभी-कभार, गाहे-बगाहे ठीक है, पर लगातार नहीं। बाजारवाद सर चढ़कर बोल रहा है हमारे सर, सब उसी की देन है।

    डायपर में फँसे हुए बेजुबान बच्चे कुछ कह तो नहीं पाते, तिसपर पहले की तरह शौच-प्रशिक्षण से वंचित रह जाते हैं और करीब दो साल, जब तक वह ठीक से बोलने लायक न हो जाएँ, डायपर में ही निवृत होते हैं दिन रात। जाने कैसे झेलते हैं बच्चे इतना अत्याचार", कचरे का डब्बा बहुत दुखी नजर आया।

नीना_सिन्हा/पटना।
व्हाट्सएप नंबर-6290273367