मेरी शाखों से पत्ते गिरे नहीं गिराए गए हैं........

मेरी शाखों से पत्ते गिरे नहीं गिराए गए हैं........
हम हटे नहीं थे , जब मंजिल करीब थी.. हटाए गये हैं

सहमे से खड़े थे, पर निडर भी थे........
इन दोनों बातों में अक्सर उलझाए गये हैं

पा सकते थे, जिसे चाह लिया था पाने को....
पर फिर, उसी शख्स से आज़माये गये हैं

जीने और साँस लेने में अंतर था जहाँ.......
ऐसे ही जगह हम पाए गये हैं

मेरी रूह को छूकर गया है कोई......
की खुद में न होकर उसमें समाये गये हैं

फिर जब जब बात चली वफ़ा की.........
तो अक्सर हम ही भरमाये गये हैं

सच और झूठ का फैसला था जहाँ........
अक्सर फिर हम ही दोषी पाए गये हैं

आसान नहीं होता दिल का टूटना ...... फिर जुड़ कर एक हो जाना.....
ये प्रयास हम ही से कराये गये हैं

जिस राह पर जाना न था "कविता" को कभी......
घेर कर फिर उसी राह पर लाये गये हैं