॥ संस्कार ॥

भूल रहें हैं हम अपनी संस्कृति
भूल रहें हैं विरासत की संस्कार
नकल हो रही है पश्चिमी सभ्यता का
हम हिंदूस्तानी हैं शर्मसार

साड़ी धोती कुरता व चोली
पहनावे सब छुट गये
जिन्स टॉप व चुस्त परिधान
भारतीय को पसंद हुए

माथे की विन्दिया पैरों की बिछिया
रो रो कर हैं लुप्त हुए
सुहागन नारी अभागन नारी का
फर्क करना भी दुर्लभ हुए

माई बाबुजी का संवोधन भी भूला
मम्मी डैडी का अब चलन बढ़ा
संयुक्त परिवार बिखर गये अब
एकल परिवार का उदय हुआ

सोलह श्रृंगार हुई अतीत की कहानी
आधुनिकता का रंग है सब पे चढ़ा
भूल गये समाज की मर्यादा
पश्चिमी सभ्यता का है भूत चढ़ा

हमारी सभ्यता का विश्व पटल पर
कभी विश्व गुरू का परचम लहराता था
र्पाश्चमी सम्यता अपनाने की होड़ में
हिन्दूस्तानी मंस्कार है फूहड़ बना

कहाँ ले जा रही है हमें आधुनिकता
कोई इसकी मंजिल दीखता ही नहीं
तेज रफ्तार से दौड़ रही है फैशन
जो रूकने वाला है ही नहीं

पर सलाम है उन र्पाश्चम के लोगों को
जो हिन्द की संस्कार अपना रहें हैं
हमारी संस्कृति से अभिभूत होकर
हरे रामा हरे कृष्णा गा रहें हैं।

उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार
9546115088