प्रेम के गलियारों में

प्रेम के गलियारों में
नीति ज्ञान का बलिदान
बहुत मीठा लगा न
इसका एक पक्ष मिठास से सराबोर है
तो दूसरा कड़वाहट की पराकाष्ठा
चूं चूं करती
गौरैया
तिनके तिनके संजोकर
बुनती है घरौंदा
किसी टूटी खपरैल तले
ताकि
बसा सके छोटा सा परिवार
एक सुख का संसार
संसार की असारता से अनभिज्ञ नहीं है
परन्तु कुछ तिनके
प्रेम के
कुछ कर्त्तव्य
कुछ दया और करुणा के
बटोर बुन डालती अपना नया संसार
और उस अंधेरे संसार में
उजाला करने
जला देती है कुछ नन्हें दीप
अब इन दीपों की गर्माहट
और आंखों को सुकून देने बाली
जगमगाहट में झूमती हुई नाचती गाती है
कितनी खुश थी वह
तभी कोई
तेज झोंका हवा का
उलट देता उन दियों को
देखते ही देखते
धू धू कर जल उठता है
उसका वह संसार
बेचारी गौरैया
किंकर्तव्यविमूढ़ सी
हाथ मलती
देखती रह जाती है
अवाक।।
                          देवयानी भारद्वाज
                        उसायनी फीरोजाबाद