क्या मौज थी अपनी भी

क्या मौज थी अपनी भी
जब हम भी कभी
टिंकू पिंकू हुआ करते थे
कभी कम्पट
कभी बिस्किट ,खट्टे मीठे चूरन , रंग बिरंगी मीठी गोलियों का दौर होता
तो कभी
आँख मिचौली ,आई स्पाइस,गिल्ली ,कंचे
गिट्टी लंगड़ी और न जाने...........
और तो और
कोई ख्यालों के जहाज उड़ाता होगा
पर हमारे तो किताबी जहाज
उड़ते भी थे और
बरसाती सागर में
जहाज भी तैरते थे
पर जब से
समझदारी से इश्क हुआ है हमें
तब से वह
गुड़ियों की बारात
टूटी हुई चूड़ियों की सौगात
वह रंग बिरंगी तैरती कश्तियाँ
बालू पर बनीं
घरौंदों की बस्तियाँ
उँगलियों पर उड़ते चील कौआ
कमरे में बैठा हौआ
सब के सब
मुँह चिढ़ाते हुए पूछते हैं कि
बहुत शौक था न
तुम्हें
बड़े होने का
अब हो गए न बड़े
बहुत बड़े
अब ..............?
                        देवयानी भारद्वाज
                      उसायनी फीरोजाबाद