मैं तो शर्मिंदा हूँ कुछ बोलता ही नहीं,,,,,,,,,

इज़हारे वफ़ा का वो पल सुहाना
जो था,याद तोआता होगा,
माज़ी का वो लम्हा कभी कभी
तुमको भी तो रूलाता होगा,
तेरे हुस्न की रानाईयों में उलझा
तो फ़िर नहीं निकल पाया,
दुपट्टा तेरा भी कभी तन्हाई में
अशकों से भीग जाता होगा,
तेरी सुरमई आँखों की चमक ,और
दिल पे चोट पहली नज़र की,
रातों के अंधेरे में उठ उठ कर कभी
तू भी तो हंसी ,बैठ जाता होगा,
मेरी उम्मीदों का दरिया बहता है, हां
अभी भी मेरी इन निग़ाहों में,
मुझे मांगने के लिए यकायक सामने
रब के तू भी बैठ जाता होगा,
सफ़र ज़िंदगी का तन्हा ,तन्हा कभी
कट सकेगा मुझसे बोलो तो,
सावन की घटओं को देखकर दिल
तेरा भी क्या न मचलता होगा,
मैं तो शर्मिंदा हूँ कुछ बोलता ही नहीं
तेरी सखियों से सच ,"मुश्ताक़"
मेरे मुत्तालिक़ तुझ से भी तो कोई,
तेरा अपना कुछ, पूछता होगा,

डॉ.मुश्ताक़ अहमद शाह - सहज़
हरदा मध्यप्रदेश,